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आदमगढ़ शैल चित्र एवं शैलाश्रय होशंगाबाद मध्यप्रदेश

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शैलचित्र- मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में रेलवे स्टेशन से 3 किलो मीटर पहाडि़यों के समूह पर आदमगढ़ शैलचित्र एवं शैलाश्रय स्थित है।  अतिप्राचीन होने के कारण इसका नाम आदमगढ़ पहाड़ी हुआ था।  डाॅ0विष्णु श्रीधर वाकणकर द्वारा जिन्होंने भीम बैठका के शैल चित्रों की खोज की है, द्वारा आदमगढ़ के शैल चित्रों एवं शैलाश्रयों की खोज की गयी थी। आदमगढ़ के शैलचित्र भीम बैठका के समकालीन हैं। जिनमें प्रमुख युद्ध्रत मानव के चित्र जिराफ का चित्र है। जिससे यह अनुमान निकलता है कि पूर्व में नर्मदा क्ष़्ोत्र में जिराफ जानवर भी हुआ करते थे विभिन्न जानवर सुअर, बारहसिंगा, हिरण हाथी,नर्तक  घोड़े के चित्र भी पाये जाते हैं। शैलचित्र  में खनिज रंग जैसे हेमेटाईट, चूना, गेरू आदि में प्राकृतिक गांेद और  पशुओं की चर्बी के साथ रंग तैयार कर पाषाण पर शैलचित्र  आदिमानव द्वारा किये गये हैं।   मानव शैलाश्रय- आदमगढ़ पहाडि़यों में ऊंचाई में आदी मानव के निवास के लिए शैलाश्रय बने हुये हैं जो कि चट्टानों को काटकर आदिमानव द्वारा तैयार किये गये हैं।  शैलाश्रयोे  की संरचना विश्वस्तरीय है...

बौद्ध उपुनिथ-महाविहार, अशोक का लधु शिलालेख श् स्तूप, शैलाश्रय और शैल चित्र (जिला सिहोर ग्राम पानगुरारिया मध्यप्रदेश) ईशा पूर्व दूसरी शताब्दी

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म0प्र0 के सिहोर जिले के बुधनी तहसील में पानगुरारिया ग्राम में उपुनिथ महाविहार स्थित है, जहाॅं पहुॅंचने के लिए निकटतम रेल्वे स्टेशन सिहोर जिले में स्थित बुधनी रेल्वे स्टेशन है, और सड़क मार्ग से होशंगाबाद पहुॅंचने के लिए नर्मदा ब्रिज पार  सलकनपुर के प्राचीन देवी स्थल पर पहॅुंचने वाले सड़क मार्ग है पर स्थित है। हवाई यात्रा से पहुॅंचने के लिए निकटतम हवाई हड्डा भोपाल है। सन् 1976 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा खोज की गई थी यहाॅं पर सम्राट अशोक के दो लघु शिलालेख और शंुगकालीन एक यष्टि लेख और पुरा मानव निवास के उपयोग में आने वाले शैलाश्रय और शैलचित्र, गुफाएं मिलते है।  1. अशोक कालीन लघु शिलालेख- अशोक कालीन लघु शिला में प्राकृत भाषा एवं ब्राम्ही लिपि में है, जो कि पत्थर से निर्मित गुफा मंे पत्थर पर उत्र्कीण किया गया है। उपरोक्त शिलालेख से यह ज्ञात होता है सम्राट अशोक द्वारा यात्रा के समय कुमार शव माणिम प्रदेश अर्थात् वर्तमान में मध्य देश का राजा था। और उपुनिथ विहार की व्यवस्था के बारे में सम्राट अशोक की ओर से विशेष व्यवस्था के सबंध में निर्देशों का उल्लेख है। 2. शंुग...

Chhatri of Maharani Laxmibai, Gwalior MADHYA PRADESH

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Maharani Laxamibai fought the British during the revolt of 1857 She jumped off the Gwalior fort along with her horse. After getting surrounded by the British army and having no chance of survival she is said to have died of her wounds at this very place. The chhatri is dedicated to her. It is a state protected monument.

मध्यप्रदेश में देवी दुर्गा (महिषासुर मर्दिनी) देवी प्रतिमा और उनके मूर्ति शिल्प का विवरण

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देवी दुर्गा- विष्णुधर्मोत्तर में वर्णित रूप के अनुसार दुर्गा आठ भुजा वाली सिंह पर सवार है जिनके हाथांे में शूल, चक्र, कपाल, शंख, धनुष-बाण, खड्ग, खेटक तथा पाश रहता है। या आठ भुजाओं शक्ति, बाण, शूल, खड्ग, चन्द्रबिम्ब, खेटक तथा कपाल आयुध रहते है। चार भुजा  दुर्गा स्वरूप में आगे का दाहिना हाथ अभय मुद्रा में और पीछा हाथ में चक्र रहता है आगे के बांये हाथ में खेटक तथा पीछे के बांये में शंख पकड़ी रहती है और पद्मासन में खड़ी हुई या महिष की पीठ अथवा सिर पर बैठती हैं। उनका वक्षः स्थल लाल वस्त्र के द्वारा ढका रहता है जो सर्प के द्वारा बंॅंधा रहता है। महिषासुर मर्दिनी-यह दुर्गा का ही रूप है। इस रूप में वे महिषासुर के साथ युद्ध करती हुई दिखायी जाती है। वैष्णव ग्रंथों में इनको चण्डिका भी कहा जाता है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में वर्णन किये अनुसार  देवी स्वर्ण  के समान शरीरधारी, त्रिनेत्र युक्त देवी  के रूप में अंकित की जाती है। जिनकी सवारी  सिंह  है और उनके बीस हाथ हैं। जिनमें दाहिनी भुजा में शूल, खड्ग, शंख, चक्र, बाण, शक्ति, वज्र, तथा डमरू रहता है। बाएॅं हाथों में ...

नोहटा शिव मंदिर(NOHTA SHIVE MANDIR.,DAMOH MADHYA-PRADESH

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सागर जबलपुर राजमार्ग पर मुख्य सडक से लगा हुआ मध्यप्रदेश राज्य के दमोह जिले की नोहटा तहसील में स्थित है । मंदिर का निर्माण कल्चुरि राजा शैव धर्मावलंबी युवराज देव प्रथम ने अपनी प्रिय रानी नोहला के आग्रह पर 915-945 ईस्वी को कराया था इसलिये मंदिर नोहलेश्वर के नाम से भी जाना जाता है । मंदिर का कुछ हिस्सा छोडकर शेष अपने मूल स्वरूप में है  मंदिर का निर्माण लगभग 100 फुट लंबाई चैडाई के और 6 फुट उंचाई वाले चबूतरे पर किया गया है । मंदिर में प्रवेशद्वार पांच शाखाओं में विभक्त है एक चैत्य,कक्षा तथा  द्वार मंडप हैं मंडप के चार मुख्य स्तंभ हैं इस मंदिर के गर्भगृह का शिखर अलंकृत युक्त है और गर्भगृह छोटा है  जिसमें शिवलिंग स्थापित है ।। सामने वाले मंडप की छत पर वर्तमान में शिखर उपलब्ध नहीं है ।  मूर्तिशिल्प अनुपम है,शिल्पाकृतियों में बारीक नक्काशी की गई है  इसमें मातिृका मूर्तियों की अधिकता है   । मुख्य द्वार  पर शीर्ष भाग में नवग्रह की मूर्तियां हैं । पाश्र्व में दांयी ओर नर्मदा और बांयी ओर यमुना की मूर्तियां हैं ।  चबूतरे के निचले भाग पर सामने दोनों ओर चा...

सिद्धिविनायक श्री गणेश मंदिर, गणेशधाम सीहोर

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भारतवर्ष में जो स्वयंभू गणेश जी के ऐसे प्रमुख चार स्थान सिद्धपुर सिहोर सिद्धिविनायक, उज्जैन के चिन्तामन गणेश जी, रंणथम्भौर संवाई माधोपुर राजस्थान के सिद्ध गणेश और सिद्धपुर गुजरात में महागणेश है। सिद्धपुर को वर्तमान में सिहोर कहा जाता है।सिहोर जिले में जो कि भोपाल से 40 किमी दूर है, पश्चिम उत्तर में पार्वती नदी के किनारे में गोपालपुर गांव में मंदिर स्थित है। स्वयंभू प्रतिमा जमीन में आधी घंसी हुई है। जो कि श्याम वर्ण काले पत्थर की स्वर्ण के समान मूर्ति का रूप दर्शित होता है।  लगभग दो हजार वर्ष पूर्व वर्तमान उज्जैन पूर्व नाम अंवतिका के परमार वंश के राजा विक्रमादित्य द्वारा विक्रम संवत 155 में मंदिर का निर्माण कराया गया था। बाद में लगभग 300 वर्ष पूर्व मंदिर का जीर्णोदार एवं सभा मंडल का निर्माण मराठा राजा पेशवा बाजीराव प्रथम द्वारा कराया गया। बाद में विक्रमादित्य के पश्चात् शलिवाहक शक, राजा भोज, कृष्णदेव राय, गौड़ राजा नवल शाह और नानाजी पेशवा विट्ठू वालो द्वारा तथा 1911 में बेगम सुल्तान जहां, 1933 में नबाब हमीदउल्लाखंा, भोपाल नबाब द्वारा मंदिर में पूजा व्यवस्था की जाती रही है। ...